Wednesday, October 22, 2008

बेचैनी - एक sketch

कभी कुछ कर जाने की जिद
कभी कुछ भी कर जाने की हद।
कभी उम्मीदों का सैलाब
कभी जिस्मो-रूह से फूटते जज़्बात।
कभी रेंगती कलम का किनारा
कभी स्याह रातों में उजले ख़्वाबों का सहारा।
कभी छटपटाहट इस कदर की कुछ सूझे ना
कभी मचलती आंखों से आंसू रुकें ही ना।
कोई सदा जो हर पल कानों में गूंजे
कभी कोई तलाश जिसे सपने हर आहट पर ढूंढें ।
कोई मचलता अफ़साना जो यूँ ही होठों पर आ जाए
कभी कोई गुज़रा वक़्त जो सड़कों पर तैरता दिख जाए।
तड़प
जो अक़्सर ख़ामोश होती है ,
भीतर सुलगती है .
जैसे हो कोई ओस की बूंद
जिसे छूने
और
उस छुअन को उंगली पर बार-बार महसूस करने का अहसास
गालों पर
आंसुओं की लकीरों से बना कोई रास्ता होगा
और
जो इसी तड़प के सहारे
शायद
चाँद तक जाता है ।

ख़्वाब - एक sketch

ख़्वाब
एक उम्मीद कुछ करने की
एक लौ हमेशा जलने की।
एक रास्ता मंज़िल तक जाने का
एक हौसला आसमान छू आने का।
एक हिम्मत मुश्किलों से जूझने की
एक कोशिश नाकामियों को सहेजने की।
एक जोश खून मे उबाल आने का
एक इरादा आख़िर में चाँद तक पहुँच जाने का।
एक कसक रफ़्तार को पाने की
एक तड़प आंखों मे पानी आने की।
एक उड़ान दूसरी दुनिया तक जाने की
एक सहर इरादों में नए पंख आने की।
एक लम्हा जो ज़िन्दगी भर याद रहे
एक साहिल जो कोहरे को भांप रहे।
ख़्वाब ,
जैसे हो फूल कोई
जो संदली ओढे रहे
एक ओस की बूंद
जो लम्स को सांसों से जोड़े रहे ।
ख़्वाब
जो मन बावरा देखता है
और जिसे फिर-फिर देखने को मन
हर पल मचलता है.......

मैं

जिस्म के अन्दर पनपते सपनों के आगे और  जिस्म के बाहर सपनों के पीछे दौड़ते-भागते सांसें कभी...