नाटक





विहान भोपाल की प्रस्तुति 





सुभद्रा



लेखक : सुदीप सोहनी
निर्देशन : सौरभ अनंत

प्रथम प्रदर्शन : 28 अक्टूबर 2013, इंदौर (म.प्र.)

















सर्वाधिकार सुरक्षित
दृश्य एक
महाभारत युद्ध का तेरहवाँ दिन
मंच पर दिये की लौ लगाती हुई सुभद्रा।
(बांसुरी की धुन)

सुभद्रा
(खुद से)
कुरुक्षेत्र की रणभूमि में आज युद्ध का तेरहवाँ दिन है। रक्तपात और हिंसा का तेरहवाँ दिन। राजनीतिक महत्वाकांक्षा, स्वार्थ और लिप्सा का तेरहवाँ दिन। बंधुत्व, प्रेम के रक्तरंजित होने और ईर्ष्या-द्वंद्व के लहलहा उठने का तेरहवाँ दिन। अहंकार और विवेकशून्यता का तेरहवाँ दिन। जीवन और मृत्यु का तेरहवाँ दिन।

(बांसुरी की विषाद भरी धुन)

सुभद्रा(...जारी)
वासुदेव ने कहा है कि आज का यह तेरहवाँ दिन महाभारत के युद्ध का एक विशिष्ट दिवस होगा। कभी ना भूला जा सक्ने वाला, लोमहर्षक, पराक्रम की पराकाष्ठा का ऐतिहासिक दिवस। मैं यह जानकर जितना गर्व से भरी हुई हूँ, उतना ही भय से भी, संशय से भी।

(बांसुरी की धुन)

सुभद्रा(...जारी)
 (रुक कर)
क्या मेरा संशय से भर जाना उचित है? युद्ध में इस तरह जीवन-मृत्यु का द्वंद्व तो बना ही रहता है। पर मुझ पगली को कौन ये समझाएगा? मेरे जीवन की धुरी यानि स्वामी अर्जुन और पुत्र अभिमन्यू, दोनों ही के बिना तो मेरे जीवन की गति ही नहीं। और फिर धनंजय के साथ तो मैं ठीक से समय भी व्यतीत नहीं कर सकी हूँ अब तक।!नहीं...नहीं...! मुझे इस समय अपने स्वार्थ के विषय में नहीं सोचना चाहिए। मेरे स्वामी से मुझे जितना मिला उतना ही कम है। संसार के सर्वोत्तम धनुर्धर की पत्नी होने का सौभाग्य। साथ ही वनवास के समय अभिमन्यु के अलावा दीदी के पांचों पुत्रों के लालन-पालन का सौभाग्य भी। तो क्या हुआ अगर मैं पार्थ से दूर रही, उत्तरदायित्व का यश तो मेरे साथ ही बदा था ना!




संशय, भय, सिहरन और दुख के सम्मिलित भावों से सोचती हुई पुनः अपने कक्ष की ओर लौटने लगती है।

फिर मन ही मन सोचती है
सुभद्रा (स्वयं से)
मेरा संशय कितना उचित है? युद्ध तो निश्चित है और परिणाम को लेकर भी मुझे कोई संदेह नहीं किन्तु ना जाने क्यों, शंकाओं, कुशंकाओं से मेरा मन बैठा जा रहा है! अनिष्ट की आशंकाओं ने मुझे आज चारों ओर से घेर लिया है। हे मधुसूदन, हे कृष्ण, इस परिस्थिति में आप ही समझ सकते हैं। आप ही बताइये
केशव, आपकी छोटी बहन के लिए कहीं सुहाग और मातृत्व की परीक्षा का दिन तो नहीं है आज?

(बुदबुदाते हुए)   
सुभद्रा(...जारी)
मैं क्या करूँ केशव, क्या करूँ?

कुछ समय रुक कर, सुभद्रा मंच पर बने प्लेटफॉर्म पर पहुँचती है।
  
(कृष्ण बनकर)
श्रीकृष्ण
सुभद्रे! काल की गति अबाध है। इस अविराम जीवन प्रवाह में
ज्ञानी होने के बाद भी हम कितने अवश, कितने नियंत्रणहीन हैं।
हमारी सारी बुद्धि और विवेक का नियंता हम नहीं कोई और है।
इसलिए पूर्ण निष्ठा से हमें केवल कर्म करते चलना है। तुम्हें भी प्रिय सुभद्रे!
आज मैं तुमसे अपने प्रिय भानजे अभिमन्यु को मांगने आया हूँ।

कृष्ण रुक कर सुभद्रा की ओर देखते हैं। सुभद्रा अविचल भाव से हाथ जोड़े खड़ी है। 

श्रीकुष्ण(...जारी)
रणभूमि में आज कौरव, कूटनीतिक युद्ध कौशल का प्रयोग करते हुए, अभेद्य चक्रव्युह की रचना करेंगे।
महाबली, महापराक्रमी पांडवों के पास भी उस चक्रव्युह को भेदने का कौशल नहीं है। केवल अभिमन्यु में है सामर्थ्य चक्रव्यूह भेदने का
गर्भ में जब था वह तुम्हारे
ज्ञान दिया था मैंने ही उसे
नैसर्गिक क्षमता है उस वीर नवतरूण
अपराजेय योद्धा मे
युद्धभूमि में पांडवों का
तारणहार वही होगा
कीर्ति अमर रहेगी उसकी
पराक्रम ध्रुव तारे की भांति
अक्षय, अमिट और जाज्वल्यमान रहेगा
सुभद्रा की ओर देख कर
श्रीकृष्ण (...जारी)
कृष्ण की यह विनय स्वीकार करो
अभिमन्यु को तिलक लगा, तैयार करो
मंच पर बने प्लेटफॉर्म से कृष्ण बनी सुभद्रा चल कर पुनः सुभद्रा की स्थिति में आ जाते हैं।
प्लेटफॉर्म पर प्रकाश का लोप।
 (नेपथ्य कोरस)
कृष्ण की यह विनय स्वीकार करो
अभिमन्यु को तिलक लगा, तैयार करो

सुभद्रा मंच के मध्य प्रकाश वृत्त में विचारमग्न खड़ी है।

सुभद्रा (स्वयं से)
अभिमन्यु! पुत्र मेरे! क्या क्षत्रिय पुत्र इतनी जल्दी बड़े हो जाते हैं?
  क्या सचमुच मेरा पुत्र आज महाभारत के इतिहास में अनोखे युद्ध कौशल का परिचय देगा?
अगर उसे कुछ हो गया तो....
नहीं...नहीं मधुसूदन ने कहा है, तारणहार होगा वो।
आखिर वो पुत्र है सर्वोत्तम धनुर्धर अर्जुन का, भांजा है श्रीकृष्ण का। 
आज जब युद्धभूमि में रिपुओं के दमन के लिए वो तैयार है, तो मुझे उसके मस्तक पर विजयश्री का तिलक लगाकर भरपूर आशीर्वाद देना चाहिए।
इस समय मुझे पगली को अपूर्व सुख और व्याकुलता मिश्रित अनुभूति हो रही है।
आज जब अस्त्र शास्त्रों से सुसज्जित, अपने विशाल कंधों पर धनुष उठाए और मस्तक पर
पांडु कुल के सुखद भविष्य के उदित होने का संकेत लेते अभिमन्यु की जय-जयकार और वीरता की प्रशंसा हो रही है और मेरी आँखों में आंसुओं की बूंदें मोती-सी चमक रही हैं,  
 मुझे स्मरण हो रहा है उस समय का  
जब अभिमन्यु मेरी कोख में ही था और कोख में रहते ही अर्जुन ने व्यूह भेदना सिखाया था ।




दृश्य दो  
सुभद्रा का स्वप्न । अर्जुन और सुभद्रा का एकांतवास। मंच पर बीचोबीच दोनों आते हैं। अर्जुन सुभद्रा का हाथ पकड़कर कुछ दूर चलते हैं। मंच पर चाँद की आकृति उभरती है। कुछ प्रेमालाप और नृत्य मुद्राओं के साथ अर्जुन सुभद्रा को चक्रव्यूह भेदन की विधी बताते हैं। सुभद्रा बीच में ही सो जाती है।

गीत (सुभद्रा अभिमन्यु को सुलाते हुए)

सुन लो सुन लो मेरे जीवन
पुत्र हो तुम मेरे पार्थ नन्दन
कोख में तुमको मैं`हूँ रखती 
अब है क्षण निद्रा शयन
आँख मुंदो पार्थ नन्दन 
सुन लो सुन लो मेरे जीवन

गीत (अर्जुन का प्रवेश)

हे सुभद्रे। मैं हूँ अर्जुन।
कर सकूँगा त्रिलोक मर्दन।
ज्ञात मुझको व्यूह भेदन।
सुन लो मुझसे आज तुम यह
युक्ति से युत व्यूह भेदन।
फेड आउट

दृश्य तीन

प्रकाश आने के साथ ही सुभद्रा मंच के बीच से नींद से खड़ी होती है। कुछ असमंजस में अपने कक्ष में एक ओर से दूसरी ओर टहलती हुई सोच रही है।

सुभद्रा(स्वयं से)
हे केशव। आपका कहना ही सर्वस्व है किन्तु, कितनी भी कोशिश करूँ इस समय मोह के अधीन ही हो रही हूँ। क्या करूँ क्षत्राणी होने के अतिरिक्त पत्नी भी हूँ और एक माँ भी।
महविनाश के इन दिनों में एक भी पल ऐसा नहीं होता जब मेरी धड़कनें शांत होती हों।
सूर्य की पहली किरण और शंख ध्वनियों का प्रभाव जहां वीरों की नसों में
हुंकार भरने लगता है, मेरी आँखें और सांसें तब तक स्पंदन से भरी रहती हैं जब तक कि सूर्यास्त न हो जाए और पांडु शिविर में विजयश्री की नाद सुनाई न पड़ जाए।
सुभद्रा (कुछ संशय)
मेरा चिंता करना अकारण ही तो नहीं। हो सकता है कि मैं युद्ध धर्म से विमुख हो कर भावनाओं के अधीन हो रही हूँ, किन्तु मेरा मन मानने को तैयार नहीं। क्या ये सब मैं अर्जुन से कह सकती हूँ?
क्या अभिमन्यु की रक्षा करने का वचन मैं उनसे ले सकती हूँ?  

सुभद्रा (संभलकर)
ये क्या आज सवेरे सवेरे अर्जुन मेरे ही कक्ष की ओर आ रहे हैं! मेरे स्वामी....अपनी दासी के पास।
नहीं..नहीं। मेरा इतना व्याकुल और अधीर होना ठीक नहीं।
इस समय मुझे अपने आप को भूल कर और सारे स्वार्थों से परे होकर,
राजधर्म और युद्धधर्म को निभाना होगा।
मेरी इतनी अधीरता से अपनी समस्याएँ कहना उन्हें नाहक ही परेशानी में डालना होगा।
नहीं...मैं उनसे कुछ नहीं कहूँगी। मैं उनसे मेरी चिंता नहीं करने को कहूँगी।

मंच पर अर्जुन का प्रवेश। सुभद्रा अर्जुन को देख कर हर्ष और विस्मय से खड़ी हो जाती है।

अर्जुन को देख कर वह अपने मन को काबू में भी रखना चाहती और उनसे खुल कर, अकेले में समय बिताने की चाह में प्रेम पूर्वक कुछ क्षण बात भी करना चाहती है। असमंजस के बाद भी वह अपने पत्नी धर्म को आगे रख, अर्जुन को युद्ध में आगे बढ्ने के लिए ही प्रेरित करती है।

सुभद्रा(प्रेमपूर्वक)
हे नरोत्तम, श्रेष्ठ धनुर्धर, अर्जुन। अपनी प्रियतमा का प्रणाम स्वीकार कीजिये!

(उसकी आँखों में प्रेम से आँसू छलक उठते हैं)
सुभद्रा(...जारी)
मेरे स्वामी! आपका आज मुझ सखि का स्मरण करना
मेरे लिये परम सौभाग्य की बात है।
आपसे प्रीति होना मेरे जीवन की सबसे बड़ी उमंग है!

(थोड़ा संभलकर)
सुभद्रा(...जारी)
एक ओर तो युद्ध के दिन, संहार और आपके बाहुबल पर पांडु कुल के भविष्य का भार है तो दूसरी ओर अपनी एकांतिक साधना और मुझ सखि के लिए प्रेम भी। पर हे कुंती नन्दन, क्या आप कुछ सशंकित तो नहीं हैं? मैं आपसे बस इतना ही कहना चाहती हूँ कि मेरी ओर से कोई चिंता ना करें।
(गर्व से और आँखों में चमक लिए)

सुभद्रा(...जारी)
ना तो इस युद्ध के परिणाम पर मुझे कोई संदेह है और ना ही आपकी विजय पर।
मैं तो उस दिन का बेसब्री से प्रतीक्षा कर रही हूँ जब आपकी इन सुंदर भुजाओं और विशाल कंधों पर रखा गाँडीव गर्व से खड़ा हो कर पूरे हस्तिनापुर की शोभा बढ़ाएगा और मुझ दासी के चेहरे की दमक आपके अधरों पर आई गर्विल मुस्कान से दुगुनी हो जाएगी।

(हाथों में हाथ लेकर)
सुभद्रा(...जारी)
हे सव्यसाची। आप मेरी ओर से निश्चिंत रहें। मेरे प्रति आपकी व्याकुलता,
प्रेम उद्दीपन और कर्त्तव्य बोध को मैं भली भांति जानती हूँ। इसलिए ही तो आपके
हर शब्द को आदेश मानकर शिरोधार्य करती हूँ। आपका प्रेम, प्रेम की अनुभूति, आपके प्रथम दर्शन, विवाह, रैवतक पर्वत पर हमारा साहचर्य और पुत्ररत्न के रूप में अभिमन्यु की प्राप्ति से मेरा जीवन सफल हो गया है पार्थ।

(झुक कर और अर्जुन के चरण स्पर्श कर के उसकी चरण रज अपने माथे पर लगाते हुए) 
सुभद्रा(...जारी)
आपका मेरा विचार करना ही मेरा सौभाग्य है।
मैं ईश्वर से आपकी और पुत्र अभिमन्यु की विजयश्री और दीर्घायु होने
की हर पल प्रार्थना करती हूँ। अब आप मेरी तनिक भी चिंता न करें और युद्ध के
 लिए प्रस्थान करें नरोत्तम।
सुभद्रा अर्जुन को द्वार से जाते देखती है।
फेड आउट

दृश्य चार
मुद्राओं के द्वारा दृश्य अभिनय

शंख, ढ़ोल – नगाड़ों की पार्श्व ध्वनि के साथ ही युद्ध का आरंभ
अभिमन्यु के युद्ध में जाने का दृश्य
तीर कमान लिए योद्धाओं का प्रवेश,                               
अभिमन्यु का चक्रव्युह भेदन
चक्रव्यूह में युद्ध 
तीर लगकर अभिमन्यु का गिरना,
गिरकर रथ का पहिया उठाकर लड़ना
तीर लगकर गिरना, अभिमन्यु की मृत्यु

गीत
पांडु कुल के भाल पर
जगमग था जो यशोवर्धन
चक्रव्यूह में बच न पाया
हे सुभद्रे! पार्थ नन्दन

दृश्य अंतिम
सुभद्रा का शिविर। कृष्ण, अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर आदि सभी पांडव सर झुकाये खड़े हैं। सभी मौन हैं।
सुभद्रा ज़मीन पर बैठी है, अचेत-सी।

(सुभद्रा)
(विलाप करती हुई)
हे अभिमन्यु ! हे पुत्र !  हे सौभद्र !
काल ने आखिर तुमको मुझसे छीन ही लिया। छल और छद्म आकांक्षाओं के इस युद्ध ने मेरी कोख सुनी कर ही दी। जब जीत के लिए नीति-नियमों से लेकर धर्म-अधर्म तक में कोई भेद नहीं और हर एक व्यक्ति को मूल्य चुकाना पड़ रहा है तो मैं कैसे शेष रहती?
मेरी समस्त चिंताएँ, अनिष्ट की आशंकाएँ, शंकाओ- कुशंकाओं और संदेह के संकेत आखिर सच साबित हो गए! पर हाय री मेरी किस्मत, जो तूने मुझे अंदेशा दिया और फिर भी मैं कुछ न कर सकी।

मगर क्या मैं छली नहीं गयी?
मधुसूदन कृष्ण और धनुर्धरों में श्रेष्ठतम अर्जुन के होते हुए तो मैंने मान ही लिया था कि अभिमन्यु को कुछ न होगा। और कृष्ण ने भी मुझसे यही कहा था मगर अपनी छोटी बुद्धि से मैं ही इस युद्ध के मायने, महत्वाकांक्षा का अर्थ समझ न सकी।  क्या ही अच्छा होता कि मैं उस दिन अर्जुन से अभिमन्यु की रक्षा का वचन ले लेती!

हे पुत्र! आँखें खोलो। अपनी माँ को एक बार देख तो लो। क्या तुम्हें मेरे अश्रुपूर्त नयन अच्छे लग रहे हैं?
क्या इसी दिन के लिए मैं अपनी कोख में लोरियाँ गा गा कर तुम्हें सुलाती थी कि एक दिन हमेशा के लिए सोता देखूँ? उठ कर खड़े क्यों नहीं हो जाते पुत्र तुम? मेरे लिए नही तो क्या तुम अपने होने वाले पुत्र के लिए खड़े नहीं हो सकते जिसे इस युद्ध ने जन्म से पहले ही पितृ सुख से वंचित कर दिया है?

हे विधाता, ये क्या लीला है आपकी? जिस समय अर्जुन व्यूह भेदने की विधि बता रहे थे तो मुझे सुला क्यों दिया? मुझे क्या पता था कि उस नींद का इतना बड़ा मूल्य मुझे चुकाना होगा?
मगर हे पुत्र मेरे, तुम तो मुझ पर दया करो। मुझ अभागी को उस रात नींद आ गयी थी तो क्या तुम इस तरह रूठ जाओगे?   

वासुदेव ने ही कहा था आज का यह तेरहवाँ दिन महाभारत के युद्ध का एक विशिष्ट दिवस होगा।
मैं पूछती हूँ जब राज्य में चारों तरफ लाशें पड़ी हुई हो, रक्त ही रक्त बिखरा हो, चीत्कारें हों, भय हो, गिद्ध मँडराते हों, और कोई रहनेवाला न हो तो ऐसी विजय का क्या अर्थ है ? किसके लिए लड़ रहे हैं हम? हम वीरांगनाएँ कौन से उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अपनी कोख को दांव पर लगा देती हैं?

क्या कोई बताएगा कि क्षत्राणियों का धर्म क्या होता है? कवच-कुंडल, शिरस्त्राण धारण किए हुए, पिता-पति-बांधवों-पुत्रों को तिलक लगाकर, आरती उतारकर, रणभूमि में भेजना, और रणचंडी को उनके मुख-कमलों की माला पहनाना?

अब से थोड़े समय पश्चात ही, सभी अपने अपने शिविरों की ओर लौट जाएंगे। अगले दिन की योजनाएँ बनाने में लग जाएंगे। अब भी मुझे युद्ध के परिणाम पर संदेह नहीं परंतु मुझ अभागी को कोई यह बता दे कि क्या सिर्फ युद्ध ही किसी समस्या का हल है?  वासुदेव ने सच नहीं कहा था कि काल की गति अबाध है। आज का यह तेरहवाँ दिन मेरे जीवन में वो अंधेरा लेकर आया है जो अब किसी भी मान, सम्मान, यश से भर नहीं पाएगा।

एक ओर जहां उस पुत्र का शव पड़ा है जिसकी आँखों, हाथों, भुजाओं, कंधों को कोमल से कठोर होते देखा है। जहां उस शिशु की किलकारी और घुटने चलते हुए तुतलाती आवाज़ में अपने लिए माँ होने के सुख को सुना और महसूस किया है, वहीं आज वो समय भी अनुभूत कर लिया जब सब कुछ उजाड़ हो गया है।

समस्त जीवन में मैंने किसी भी सुख की कामना नहीं की। न ही पति की कामना, न ही मान-सम्मान की। द्रोपदी पांचाली बन गईं किन्तु मैंने अर्जुन से अपने अधिकार की बात नहीं की। द्यूत के बाद वनवास के समय बारह वर्षों का वियोग झेल कर भी उत्तरदायित्वों से मुंह नहीं मोड़ा। युद्ध भी मेरे द्वारा नहीं चाहा गया, द्रोपदी से लेकर युधिष्ठिर, कृष्ण, दुर्योधन और समस्त कुरुओं-पांडवों की आकांक्षाओं, इच्छाओं के बीच मुझ तुच्छ की क्या ही हैसियत कि युद्ध न हो सके। किन्तु इसका परिणाम झेलने को मैं ही क्यों अभिशप्त हूँ?   

हे अभिमन्यु। हे पुत्र! 

नियति अगर यही है तो मुझे अपने आप पर तरस आता है जो न सम्पूर्ण पत्नी बन सकी और ना ही माँ। पुत्रवधू बनकर भी मेरा त्याग कोई काम न आया और एक स्त्री के रूप में भी मैं आज किनारे पर असहाय खड़ी हूँ जहां से जीवन को पकड़ने का कोई छोर दिखाई नहीं पड़ता।



(दर्शकों की तरफ )
महाभारत का विशाल रंगमंच द्वापर की चिता भस्म पर खड़ा है। कौरव और पांडवों की यह कथा एक श्रेष्ठ सभ्यता की मौत का इतिहास है।

(अभिमन्यु के शव को पकड़ते हुए)

गीत

सुन लो सुन लो मेरे जीवन
पुत्र हो तुम मेरे पार्थ नन्दन
कोख में तुमको मैं`हूँ रखती 
अब है क्षण निद्रा शयन
आँख मुंदो पार्थ नन्दन 
सुन लो सुन लो मेरे जीवन

प्रकाश धीमे धीमे से कम होता है 

समाप्त

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मैं

जिस्म के अन्दर पनपते सपनों के आगे और  जिस्म के बाहर सपनों के पीछे दौड़ते-भागते सांसें कभी...