उन्हें रंगमंच के नाम पर होने वाले मनोरंजन पसंद नहीं, रचनात्मकता उनके लिए क्रिया नहीं बल्कि प्रतिक्रिया है, उनका कहना है की एक अच्छी-सी कविता लिखने के बाद चाय बना कर वो उसका celebration करते हैं, वो भारत के रंगजगत में हिंदी रंगमंच को अपनी जिद और जिजीविषा से एक अलग ही पहचान देने में जुटे हुए हैं, उनका परिचय सिर्फ इतना है कि वो मानव कौल हैं .
मानव कौल से मिलना एक रोमांचकारी अनुभव है. भारत के रंग जगत में, ख़ास तौर से हिंदी रंगमंच की जहाँ अपनी पहचान धुंधली होती जा रही है वहीँ धूम-धड़ाके और मौज-मस्ती के शहर मुंबई में ,मानव हिंदी थियेटर को नए मानक देने में मशगूल हैं. पृथ्वी थियेटर के गलियारे में हुई बातचीत -
प्रश्न :रंगमंच और उस से जुड़े सवालों के पहले मैं अतीत को टटोलना चाहूँगा और मानव कौल की जड़ों को खंगालना चाहूँगा. शुरुआत किस तरह हुई ?
मानव : मेरी पैदाइश कश्मीर की है.मध्यप्रदेश के छोटे से शहर होशंगाबाद में पला-बढ़ा . भोपाल अक्सर जाना होता था. धीरे-धीरे ख़ुद को भोपाल थियेटर के गलियारे में पाया. २०-२२ साल की उम्र रही होगी जब थियेटर से लगाव होने लगा, लगा ये सुन्दर है . मैं जो कुछ सोचता था दुनिया को , लोगों को तो मेरी सोच से हमेशा १ स्टेप आगे ही लगा मुझे थियेटर . वो उम्र ही कुछ ऐसी होती है जब excitment और energy बहुत ज्यादा होती है. मैं भी थियेटर की उत्तेजना को भीतर महसूस करने लगा और इस तरह सफ़र की शुरुआत हुई .
प्रश्न : भोपाल थियेटर में क्या ऐसा अधूरापन लगा जिसके कारण मुंबई की ओर रुख किया ?
मानव : भोपाल में थियेटर करते करते मैं ख़ुद से उबने लगा.एक ही तरह की community के सामने थियेटर करते रहना मुझे पसंद नहीं आ रहा था. सोचा दिल्ली की राह निकलूंगा. फिर मन में उथल-पुथल हुई और १९९८ में मुंबई आ गया . भोपाल में थियेटर करते हुए एक अकड़-सी आ गयी थी कि मैं थियेटर करता हूँ, अभिनेता हूँ .
मुंबई में आकर,यहाँ के विशाल फलक को देख-सोचकर वो अकड़ जाती रही.सत्यदेव दुबे जी जैसे गुरु मिले जिनके साथ करीब ७ साल तक रहकर थियेटर को एक नयी आँख से जज़्ब करने का मौका मिला .
प्रश्न : फिल्म में काम करने का इरादा तो होगा ही ?
मानव : हाँ, शुरुआत में फिल्म करने का मन था और बच्चों की मनोरंजक फिल्म " जजंतरम ममंतरम" में नायक की भूमिका की. लेकिन पहली ही फिल्म में काम करते हुए मैं बोर होने लगा. मन में अजीब-सा कुछ चल रहा था. यूँ थियेटर में अभिनय करते हुए कुछ १० साल हो गए थे,पहली ही फिल्म हिट भी हो गयी थी और मेरा काम भी. लेकिन भीतर एक बेचैनी सुलग रही थी .
प्रश्न : वो क्या छटपटाहट थी जिसके कारण आप अभिनय से दूर हो रहे थे और जिसके कारण आपको लगा कि नाटकों का लेखन/निर्देशन उस बेचैन मन का किनारा हो सकता है ?
मानव : पहली बात तो ये थी कि वो बेचैनी अब भी है और हमेशा बनी रहेगी जब तक थियेटर करूँगा . मुझे साहित्य पढने में दिलचस्पी थी,लेकिन मुझे किसी भी तरह का set form पसंद नहीं था. मुझे मुंबई में होने वाले हास्य नाटक पसंद नहीं थे. कहानियाँ मुझे पसंद नहीं आती, हमेशा एक अज्ञात कि तलाश करते विचार पसंद आते. निर्मल वर्मा, विनोद कुमार शुक्ल जैसे लेखक मेरे पसंदीदा हैं जो सघन में भी चुप्पी को तोड़ते हैं .
यही कारण था कि पुराने लिखे गए नाटक और उनके मंचन मुझे समझ नहीं आ रहे थे, उनसे कोई तालमेल न होता और मुझे लगता कि किताबों से उठाये ये संवाद बोलकर मैं थियेटर कि ज़मीन पर खड़ा नहीं हो पाउँगा. ये 2003 की बात है और इन सब सवालों के बाद एक साल के लिए मैंने मुंबई छोड़ दिया.वो एक साल मैं जैसे अज्ञातवास में चला गया था, बड़ा अजीब दौर था वो !! फिर 2004 में कुछ दोस्तों के साथ " अरण्य " ग्रुप बना और फिर मैं अपने लिखे नाटकों का मंचन करने लगा. लिखना मुझे शुरू से बेहद पसंद था .
मैं पहले कवि हूँ, फिर एक अभिनेता और बाद में निर्देशक. पहला नाटक " शक्कर के पांच दाने" लिखा . . इस एक पात्रीय नाटक को मंचित करने का मकसद अपनी आवाज़ सुनाना नहीं बल्कि एक प्रयोग था जिसे काफी पसंद किया गया .
प्रश्न : आपके नाटकों में बिंदासपन और मौलिकता के साथ ही गहराई और एक तरह की दार्शनिकता भी है. क्या आपको नहीं लगता आप जैसा युवा serious किस्म का vision लेकर थियेटर कर रहा है?
मानव : पहली बात तो यह की मैं अपने लेखन को serious नहीं मानता ,मेरा लेखन humorous है. यह कोई रचनात्मकता नहीं बल्कि प्रतिक्रिया है. मैं कोई ऐसी बड़ी बात कहना नहीं चाहता जो दार्शनिक हो, बल्कि मेरे लिए तो हर तरह की कला एक प्रतिक्रिया है. आप जैसा दुनिया को देखते हो और जो प्रतिक्रिया करते हो वही expression है जिसे मैं कलम के ज़रिये व्यक्त करता हूँ .मुझे मुक्तता पसंद है इसलिए बंधन नहीं है मेरे लेखन में. इसीलिए "शक्कर के पांच दाने" जैसा विचार भी है , "पार्क" जैसा हास्य भी और अब "रेड स्पेरो" जैसा humour और विचार का मिलाजुला भी .
मुझे हमेशा अनछुए अर्थों की तलाश करना, खुद से सवाल करना अच्छा लगता है. जो मैं हूँ और जो मैं कतई नहीं होना चाहता, इन दो सिरों के बीच मुझे अपनी बात कहने का बड़ा केनवास मिलता है और इसी idealistic सोच के कारण मेरा लेखन हमेशा एक नयी खोज करता रहता है. जहाँ तक vision की बात है मैं कोई vision लेकर,सोच कर नहीं लिखता . अगर आपको पता है की ज़िन्दगी में अगला क्षण क्या होगा तो उस पल का कुछ मज़ा नहीं...!!! मेरे नाटक में भी यही होता है...कोई बना-बनाया form नहीं, शुरुआत और अंत भी ऐसे ही unusual ही होता है.
प्रश्न : आधुनिक हिंदी रंगमंच में आपने नयी दिशा और उर्जा भरने का काम कर दिया है. खुद से क्या अपेक्षाएं हैं ?
मानव : मैं अपेक्षाएं नहीं करता. मैं बहुत छोटा आदमी हूँ और थियेटर मुझे समझ भी नहीं आता है . सिर्फ इस माध्यम से अपनी बात कहना चाहता हूँ .नाटक एक momentry (क्षणिक) कला है, थियेटर के बहार आकर लोग भूल जाते हैं. मैं भी अपना काम करने के बाद भूल जाता हूँ और इसीलिए मैं खुद से कोई अपेक्षा भी नहीं करता . जब तक मेरे पास कहने और सुनाने के लिए कुछ होगा तब तक अपनी बात जहां भी रखने का मौका मिलेगा थियेटर के माध्यम से कहता रहूँगा . मैं किसी की सोच नहीं बदल सकता . कभी कविता लिखता हूँ तो मेरे २ हफ्ते अच्छे बीतते हैं. अपेक्षाओं का बोझ लेकर मैं बड़ा नहीं बनना चाहता हूँ, ज़मीन से जुड़े रहना ही पसंद है मुझे और वहीँ रहना चाहता हूँ. जिस दिन मेरे पास कहने को कुछ न होगा थियेटर वगैरह सब छूट जायेगा .....
मानव : मैं अपेक्षाएं नहीं करता. मैं बहुत छोटा आदमी हूँ और थियेटर मुझे समझ भी नहीं आता है . सिर्फ इस माध्यम से अपनी बात कहना चाहता हूँ .नाटक एक momentry (क्षणिक) कला है, थियेटर के बहार आकर लोग भूल जाते हैं. मैं भी अपना काम करने के बाद भूल जाता हूँ और इसीलिए मैं खुद से कोई अपेक्षा भी नहीं करता . जब तक मेरे पास कहने और सुनाने के लिए कुछ होगा तब तक अपनी बात जहां भी रखने का मौका मिलेगा थियेटर के माध्यम से कहता रहूँगा . मैं किसी की सोच नहीं बदल सकता . कभी कविता लिखता हूँ तो मेरे २ हफ्ते अच्छे बीतते हैं. अपेक्षाओं का बोझ लेकर मैं बड़ा नहीं बनना चाहता हूँ, ज़मीन से जुड़े रहना ही पसंद है मुझे और वहीँ रहना चाहता हूँ. जिस दिन मेरे पास कहने को कुछ न होगा थियेटर वगैरह सब छूट जायेगा .....
प्रश्न : जाहिर सी बात है कि एक कस्बाई छटपटाते मन से मानव कौल बनने का सफ़र खुद के अनुभवों का ही परिणाम है. मानव कौल की अपनी creativity और सीखने की क्या फिलोसोफी है ?
मानव : मेरा मानना है कि creativity शब्द ही सरासर गलत है. मेरे हिसाब से इसे प्रतिक्रिया कहना ज्यादा उपयुक्त होगा. जहाँ तक सीखने की बात है मैंने हमेशा न सीखने पर जोर दिया है.कोई काम करने के पहले हमारा दिमाग यही कहता है कि पहले सीखो, जबकि ये सही नहीं है. हमारे इस दुनिया में आने के पहले लोग अपनी तरह से काम करते थे. मेरी समझ से वर्त्तमान ही महत्त्वपूर्ण है. कोई काम करने की मेरी साधारण सी approach होती है जो दिखता है उसे एक खास और तार्किक नजरिये से महसूस करना और उस पर प्रतिक्रिया करना. यही मेरा थिएटर है .





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