जब मंच पर हों अनुपम खेर तो "कुछ भी हो सकता है "
मुंबई के दक्षिणी छोर स्थित संगीत नाट्य अकादमी (एन.सी.पी.ए.) का प्रतिष्ठित टाटा सभागार.
नवम्बर 2010 की 12 तारीख़ और दिन शुक्रवार.
आज ही टाइम्स ऑफ़ इंडिया और लवासा सिटी के मुख्य प्रायोजन में मुंबई की साहित्यिक बिरादरी "लिटरेचर लाइव 2010" के इस तीन दिनी आयोजन की शुरूआती आगवानी कर रही है.दिन भर इतर विषयों पर चली साहित्यिक बहस के बाद शाम, प्रसिद्ध अभिनेता अनुपम खेर से रूबरू होने के लिए उतावली है. सभागार खचाखच भरा हुआ है फिर भी 'पिन ड्रॉप साइलेंस' जैसा कुछ है.
सभी टकटकी लगाये हुए मंच पर देख रहे हैं कि मंच के किस कोने से अनुपम खेर अपनी एंट्री लेते हैं.
चुप्पी को तोड़ते हुए अचानक एक आवाज़ उस तरफ से आती है जहाँ से दर्शक सभागार में दाख़िल हुए हैं - "क्या बात है आप सब लोग इतने चुप क्यों हैं..बातें कीजिये..."
सभी अपने मुंह उस आवाज़ की ओर ले जाते हैं. एक पल को सब ख़ामोश और दूसरे ही पल एक गोरे-चिट्टे मझोले क़द के दबीज़-सी शख्सियत वाले जाने-पहचाने आदमी को देखकर लोग हैरत और विस्मय से देखकर तालियाँ बजाने लगते हैं.
जी हाँ, ये तालियाँ अनुपम खेर के लिए ही हैं. अनुपम अपने इसी अंदाज़ में दर्शकों से रूबरू होते हैं.
पूरे सभागार में बैठे लोगों से मिलते हैं, उनसे बातें करते हैं और मंच पर आने की अनुमति लेते हैं.
......और इस तरह शुरू होता है अनुपम खेर के एकल अभिनय वाला उनका बहुचर्चित नाटक "कुछ भी हो सकता है".
फ़िरोज़ अब्बास खान के निर्देशन में अनुपम अब तक इस नाटक की कुछ 200 से ज़्यादा प्रस्तुतियाँ दे चुके हैं.
कहानी अनुपम की स्वयं की जीवनी है जिसमें उन्होंने अपने शिमला से निकल कर बॉलीवुड तक का सफ़र अपने उसी अंदाज़ में बयां किया है जिसके लिए वो जाने जाते हैं. बचपन,लड़कपन,जवानी,शिमला, दादाजी की सीखें और दादी की बचपन में सुनाई कहानियां, माँ-पिता की बातें और घर के संस्कार, मित्र, पहला प्रेम, एन.एस.डी.और अपने गुरु, मुंबई, संघर्ष, फ़िल्मी करियर और इन सब के साथ जुड़े ज़िन्दगी के तमाम उजले-धुंधले, खट्टे-मीठे अनुभव और याद के रंग, जब ख़ुद अनुपम की ज़ुबानी मंच पर अभिनीत होते हैं तो तीन घंटे कैसे गुज़र जाते हैं पता भी नहीं चलता. अपने हास्य बोध और ह्यूमर के मिले-जुले के साथ खेर अपनी ज़िन्दगी के तमाम उतार-चढ़ाव और संघर्ष की दास्तान को अभिनय से बहुत उंचाई पर ले जाते हैं.
ज़िन्दगी के फलसफे को प्रस्तुत करते हुए खेर, कई बार बचपन में की गयी कई शरारतों को उसी मासूमियत और चुहल से एक बार फिर जीते दिखते हैं और अपनी अदायगी से दर्शकों को हंसा-हंसा कर लोटपोट कर देते हैं तो कहीं-कहीं संघर्ष के दिनों में धूल फांकती अपनी ज़िद और जद्दोजहद के कई घटनाक्रमों से आँख गीली कर जाते हैं. इन सबके बीच किसी भी परिस्थिति में हमेशा सकारात्मकता और ऊर्जा बटोर लेने की अपनी फ़िलोसोफी के फ़ायदे गिनाना भी नहीं भूलते हैं.
मज़ेदार तरीके से एक किस्सा सुनाते हुए खेर कहते हैं कि "फिल्म सारांश में बी.बी प्रधान के रोल के लिए मैंने 6 महीने तक उस किरदार पर काम किया और जब रोल उनके बजे स्व. संजीव कुमार को दिए जाने की बात सामने आयी तो उन्होंने महेश भट्ट को श्राप देते हुए उनसे कहा कि आप ने मुझे धोखा दिया है. महेश ने मेरी बात को सुना और फिर सारांश का वह रोल मुझे ही करने को मिला"
अनुपम खेर ने अपने अभिनय से उन तमाम गुज़रे अनुभवों को बहुत गहराई,सूक्ष्मता, ईमानदारी और पारदर्शिता से साझा किया है जो उन्हें एक अभिनेता के रूप में स्थापित और सर्वमान्य कलाकार का दर्जा दिलाने वाले कारक सिद्ध हुए हैं. यही कारण है कि संग-ए-मील के अपने तमाम साथी दादा-दादी ,माँ-पिता, दोस्त विजय सहगल, रंगमंच के अपने गुरुओं स्व.बलवंत गार्गी, अमल अलाना और इब्राहीम अल्काज़ी, फ़िल्म इंडस्ट्री के मित्र महेश भट्ट,सुभाष घई, स्व.संजीव कुमार, सतीश कौशिक, पत्नी किरण खेर आदि और उनके क़िस्से कई बार ज़िक्र में आते हैं.
अपने जीवन के तमाम उतार-चढ़ाव और सफ़लता-असफ़लताओं के बीच गहरी रेखा पाटने वाले खेर अपनी इस कहानी में, कभी जिंदगी की कड़वी सच्चाई को हास्य के रूप में तो कभी उस सच्चाई का सामना कर के उस से लड़ने की कूबत अर्जित करने के रूप में, उम्मीद और उजाले की संभावनाओं को हर क्षण तलाशते दिखाई देते हैं.
अनुपम खेर को मंच पर देखना वाकई रोमांचक है. नैरेटिव शैली का यह प्रदर्शन इस अर्थ में भी अलग है कि खेर ने आमफहम मंचन की सारी औपचारिकताओं से परे इसे क़िस्सागोई का एक ऐसा फॉर्म दिया है जिसमे वो कई बार दर्शकों के साथ कई और बातें करते हुए उनके साथ एक आम दर्शक ही बन जाते हैं और फिर एक झटके में पुन: किरदार में वापस आ जाते हैं.ये उनकी अपनी ज़बरदस्त प्रतिभा ही है जिसमें उन्होंने अपने सम्पूर्ण अभिनेता होने का वो प्रमाण दिया है जिसकी दरकार कभी भी नहीं रही...!!

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