Tuesday, March 8, 2011

पेन्सिल

कापी के अनबांचे पन्नों पर
पेन्सिल से कुछ कुरेदने लगा हूँ
इन दिनों
जाने कब पेन्सिल
बन गयी ज़रिया फिर से
पेन्सिल वही
लिखना जिससे छोड़ चुका था,
तीसरी या शायद चौथी में
ताकि पेन पकड़कर
आगे बढ़ जाऊं
सयाना कहलाऊं
आज
फिर लौट रहा हूँ
अतीत में
बटोरना चाह रहा हूँ
इधर-उधर छिटकी
नादानी
वो बचपन की
और
उस अपढ़ उम्र की
शब्द
जो सीखे थे उन दिनों
और
उकेर लिया था जिन्हें
मन की कोरी किताब पर
यथा रूप
उस निपट-सहज वय में
आज अर्थ उनके खुले हैं कई,
बहुत सारे


लौटना चाहता हूँ
उस बचपन में फिर से
और
थामना चाहता हूँ
वही पेन्सिल
जो
उस ज़माने में
कापी के केनवास पर
रच देती थी सारा जहां
लौटना चाहता हूँ
उन्हीं शब्दों में
जो
पेन्सिल की जुबानी तुतलाते थे उन दिनों
लौटना चाहता हूँ
उसी सयानेपन में
जहाँ मन का पनीलापन सारा आसमान था
लौट पाना पर, अब
मुमकिन नहीं किसी भी तरह
वक़्त का ' आज ', क्योंकि
घूर रहा है मुझे,
ज़माना भी दौड़ रहा है,
फिर शब्द और बचपन भी वैसे न रहे
और पेन्सिल
अब शायद वो भी सयानी हो गयी है !!

No comments:

मैं

जिस्म के अन्दर पनपते सपनों के आगे और  जिस्म के बाहर सपनों के पीछे दौड़ते-भागते सांसें कभी...