Tuesday, March 8, 2011

सिगरेट



 
हाथों की उँगलियों में फँसी
धीरे-धीरे सुलगती
धुआँ उड़ाती
राख बनाती
निगोड़ी मस्लहत के मानी सिखा रही है मुझको

ख़ामोशी भी आग हो सकती है …..

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मैं

जिस्म के अन्दर पनपते सपनों के आगे और  जिस्म के बाहर सपनों के पीछे दौड़ते-भागते सांसें कभी...