जब समंदर दे रहा था उस सांझ को
सरसराहट के छपाके
वहीँ उसी किनारे झुरमुटियों के बीच बसे एक रेहटी मंच के पास
झक-सफ़ेद कुर्ते में
पाँव ऊपर पाँव धरे
और ठ्योरी पर हाथ रखे
दिखाई दी मुझे वो नज़्म
पीछा कर रहा था जिसका मैं कुछ समय से !!
शब्दों से तो फिर भी मुलाकात थी, उसके
पर आवाज़ अब भी अनजानी ही थी मुझसे !!
अचानक झन्नाए कान के परदे
नज़्म भीतर प्रवेश कर रही थी ..
अहा !! क्या नज़्म थी
गुलज़ार नाम की.
मुझसे इस नज़्म का वादा था, मिलेगी मुझको
कल शाम मिली मुझे
बांद्रा फोर्ट में
2 comments:
kya baat hai yaar !!!
wah kya bat hai.....tmhe pura gulzar kahu ya aadhi tasveer kahu..ya maa ke hatho ka kheer kahu.....muskan to chehre me dono late hai...hehe
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