Tuesday, March 8, 2011

A meeting with Gulzar sahab

अलसायी-सी सांझ थी वो बांद्रा फोर्ट की 
जब समंदर दे रहा था उस सांझ को
सरसराहट के छपाके
वहीँ उसी किनारे झुरमुटियों के बीच बसे एक रेहटी मंच के पास
झक-सफ़ेद कुर्ते में
पाँव ऊपर पाँव धरे
और ठ्योरी पर हाथ रखे
दिखाई दी मुझे वो नज़्म
पीछा कर रहा था जिसका मैं कुछ समय से !!
शब्दों से तो फिर भी मुलाकात थी, उसके
पर आवाज़ अब भी अनजानी ही थी मुझसे !!
अचानक झन्नाए कान के परदे
नज़्म भीतर प्रवेश कर रही थी ..

अहा !! क्या नज़्म थी
गुलज़ार नाम की.
मुझसे इस नज़्म का वादा था, मिलेगी मुझको
कल शाम मिली मुझे
बांद्रा फोर्ट में

2 comments:

ashish_mangrole said...

kya baat hai yaar !!!

jimmy said...

wah kya bat hai.....tmhe pura gulzar kahu ya aadhi tasveer kahu..ya maa ke hatho ka kheer kahu.....muskan to chehre me dono late hai...hehe

मैं

जिस्म के अन्दर पनपते सपनों के आगे और  जिस्म के बाहर सपनों के पीछे दौड़ते-भागते सांसें कभी...