Sunday, February 27, 2011

मुलाक़ात - मानव कौल



उन्हें रंगमंच के नाम पर होने वाले मनोरंजन पसंद नहीं, रचनात्मकता उनके लिए क्रिया नहीं बल्कि प्रतिक्रिया है, उनका कहना है की एक अच्छी-सी कविता लिखने के बाद चाय बना कर वो उसका celebration करते हैं, वो भारत के रंगजगत में हिंदी रंगमंच को अपनी जिद और जिजीविषा से एक अलग ही पहचान देने में जुटे हुए हैं, उनका परिचय सिर्फ इतना है कि वो मानव कौल हैं .
मानव कौल से मिलना एक रोमांचकारी अनुभव है. भारत के रंग जगत में, ख़ास तौर से हिंदी रंगमंच की जहाँ अपनी पहचान धुंधली होती जा रही है वहीँ  धूम-धड़ाके और मौज-मस्ती के शहर मुंबई में ,मानव हिंदी थियेटर को नए मानक देने में मशगूल हैं. पृथ्वी थियेटर के गलियारे में हुई बातचीत -

प्रश्न :रंगमंच और उस से जुड़े सवालों  के पहले मैं अतीत को टटोलना चाहूँगा और मानव कौल की जड़ों को खंगालना चाहूँगा. शुरुआत किस तरह हुई ?
मानव : मेरी पैदाइश कश्मीर की है.मध्यप्रदेश के छोटे से शहर होशंगाबाद में पला-बढ़ा . भोपाल अक्सर जाना होता था. धीरे-धीरे ख़ुद को भोपाल थियेटर के गलियारे में पाया. २०-२२ साल की उम्र रही होगी जब थियेटर से लगाव होने लगा, लगा ये सुन्दर है . मैं जो कुछ सोचता था दुनिया को , लोगों को तो मेरी सोच से हमेशा १ स्टेप आगे ही लगा  मुझे  थियेटर . वो उम्र ही कुछ ऐसी होती है जब excitment और energy बहुत ज्यादा होती है. मैं भी थियेटर की उत्तेजना को भीतर महसूस करने लगा और इस तरह सफ़र की शुरुआत हुई .

प्रश्न :   भोपाल थियेटर में क्या ऐसा अधूरापन लगा जिसके कारण मुंबई की ओर रुख किया ?
मानव : भोपाल में थियेटर करते करते मैं ख़ुद से उबने लगा.एक ही तरह की community के सामने थियेटर करते रहना मुझे पसंद नहीं आ रहा था. सोचा दिल्ली की राह निकलूंगा. फिर मन में उथल-पुथल हुई और १९९८ में मुंबई आ गया . भोपाल में थियेटर करते हुए एक अकड़-सी आ गयी थी कि मैं थियेटर करता हूँ, अभिनेता हूँ .
मुंबई में आकर,यहाँ के विशाल फलक को देख-सोचकर वो अकड़ जाती रही.सत्यदेव दुबे जी जैसे गुरु मिले जिनके साथ करीब ७ साल तक रहकर थियेटर को एक नयी आँख से जज़्ब करने का मौका मिला .

प्रश्न :  फिल्म में काम करने का इरादा तो होगा ही ?
मानव  : हाँ, शुरुआत में फिल्म करने का मन था और बच्चों की मनोरंजक फिल्म " जजंतरम ममंतरम" में नायक की भूमिका की. लेकिन पहली ही फिल्म में काम करते हुए मैं बोर होने लगा. मन में अजीब-सा कुछ चल रहा था. यूँ थियेटर में अभिनय करते हुए कुछ १० साल हो गए थे,पहली ही फिल्म हिट भी हो गयी थी और मेरा काम भी. लेकिन भीतर एक बेचैनी सुलग रही थी .

प्रश्न :  वो क्या छटपटाहट थी जिसके कारण आप अभिनय से दूर हो रहे थे और जिसके कारण आपको लगा कि नाटकों का लेखन/निर्देशन उस बेचैन मन का किनारा हो सकता है ?
मानव : पहली बात तो ये थी कि वो बेचैनी अब भी है और हमेशा बनी रहेगी जब तक थियेटर करूँगा . मुझे साहित्य पढने में दिलचस्पी थी,लेकिन मुझे किसी भी तरह का set form पसंद नहीं था. मुझे मुंबई में होने वाले हास्य नाटक पसंद नहीं थे. कहानियाँ मुझे पसंद नहीं आती, हमेशा एक अज्ञात कि तलाश करते विचार पसंद आते. निर्मल वर्मा, विनोद कुमार शुक्ल जैसे लेखक मेरे पसंदीदा हैं जो सघन में भी चुप्पी को तोड़ते हैं .
यही कारण था कि पुराने लिखे गए नाटक और उनके मंचन मुझे समझ नहीं आ रहे थे, उनसे कोई तालमेल न होता और मुझे लगता कि किताबों से उठाये ये संवाद बोलकर मैं थियेटर कि ज़मीन पर खड़ा नहीं हो पाउँगा. ये 2003 की बात है और इन सब सवालों के बाद एक साल के लिए मैंने मुंबई छोड़ दिया.वो एक साल मैं जैसे अज्ञातवास में चला गया था, बड़ा अजीब दौर था वो !! फिर 2004 में कुछ दोस्तों के साथ " अरण्य " ग्रुप बना और फिर मैं अपने लिखे नाटकों का मंचन करने लगा. लिखना मुझे शुरू से बेहद पसंद था .
मैं पहले कवि हूँ, फिर एक अभिनेता और बाद में निर्देशक. पहला नाटक " शक्कर के पांच दाने" लिखा . . इस एक पात्रीय नाटक को मंचित करने का मकसद अपनी आवाज़ सुनाना नहीं बल्कि एक प्रयोग था जिसे काफी पसंद किया गया .

प्रश्न : आपके नाटकों में बिंदासपन और मौलिकता के साथ ही गहराई और एक तरह की दार्शनिकता भी है. क्या आपको नहीं लगता आप जैसा युवा serious किस्म का vision लेकर थियेटर कर रहा है?
मानव :  पहली बात तो यह की मैं अपने लेखन को serious नहीं मानता ,मेरा लेखन humorous है. यह कोई रचनात्मकता नहीं बल्कि प्रतिक्रिया है. मैं कोई ऐसी  बड़ी बात कहना नहीं चाहता जो दार्शनिक हो, बल्कि मेरे लिए तो हर तरह की कला एक प्रतिक्रिया है. आप जैसा दुनिया को देखते हो और जो प्रतिक्रिया करते हो वही expression है जिसे मैं कलम के ज़रिये व्यक्त करता हूँ .मुझे मुक्तता पसंद है इसलिए बंधन नहीं है मेरे लेखन में. इसीलिए "शक्कर के पांच दाने" जैसा विचार भी है , "पार्क" जैसा हास्य भी और अब "रेड स्पेरो" जैसा humour और विचार का मिलाजुला भी 
मुझे हमेशा अनछुए अर्थों की तलाश करना, खुद से सवाल करना अच्छा लगता है. जो मैं हूँ और जो मैं कतई नहीं होना चाहता, इन दो सिरों के बीच मुझे अपनी बात कहने का बड़ा केनवास मिलता है और इसी idealistic सोच के कारण मेरा लेखन हमेशा एक नयी खोज करता रहता है. जहाँ तक vision की बात है मैं कोई vision लेकर,सोच कर नहीं लिखता . अगर आपको पता है की ज़िन्दगी में अगला क्षण क्या होगा तो उस पल का कुछ मज़ा नहीं...!!!  मेरे नाटक में भी यही होता है...कोई बना-बनाया form नहीं, शुरुआत और अंत भी ऐसे ही unusual ही होता है.

प्रश्न :  आधुनिक हिंदी रंगमंच में आपने नयी दिशा और उर्जा भरने का काम कर दिया है. खुद से क्या अपेक्षाएं हैं ? 
मानव :  मैं अपेक्षाएं नहीं करता. मैं बहुत छोटा आदमी हूँ और थियेटर मुझे समझ भी नहीं आता है . सिर्फ इस माध्यम से अपनी बात कहना चाहता हूँ .नाटक एक momentry (क्षणिक) कला है, थियेटर के बहार आकर लोग भूल जाते हैं. मैं भी अपना काम करने के बाद भूल जाता हूँ और इसीलिए मैं खुद से कोई अपेक्षा भी नहीं करता . जब तक मेरे पास कहने और सुनाने के लिए कुछ होगा तब तक अपनी बात जहां भी रखने का मौका मिलेगा थियेटर के माध्यम से कहता रहूँगा . मैं किसी की सोच नहीं बदल सकता . कभी कविता लिखता हूँ तो मेरे २ हफ्ते अच्छे बीतते हैं. अपेक्षाओं का बोझ लेकर मैं बड़ा नहीं बनना चाहता हूँ, ज़मीन से जुड़े रहना ही पसंद है मुझे और वहीँ रहना चाहता हूँ. जिस दिन मेरे पास कहने को कुछ न होगा थियेटर वगैरह सब छूट जायेगा .....

प्रश्न : जाहिर सी बात है कि एक कस्बाई छटपटाते मन से मानव कौल बनने का सफ़र खुद के अनुभवों का ही परिणाम है. मानव कौल की अपनी creativity और सीखने की क्या फिलोसोफी है ?
मानव : मेरा मानना है कि creativity शब्द ही सरासर गलत है. मेरे हिसाब से इसे प्रतिक्रिया कहना ज्यादा उपयुक्त होगा. जहाँ तक सीखने की बात है मैंने हमेशा न सीखने पर जोर दिया है.कोई काम करने के पहले हमारा दिमाग यही कहता है कि पहले सीखो, जबकि ये सही नहीं है. हमारे इस दुनिया में आने के पहले लोग अपनी तरह से काम करते थे. मेरी समझ से वर्त्तमान ही महत्त्वपूर्ण है. कोई काम करने की मेरी साधारण सी approach होती है जो दिखता है उसे एक खास और तार्किक नजरिये से महसूस करना और उस पर प्रतिक्रिया करना. यही मेरा थिएटर है . 

मुलाक़ात - अनुपम खेर

जब मंच पर हों अनुपम खेर  तो "कुछ भी हो सकता है "


मुंबई के दक्षिणी छोर स्थित संगीत नाट्य अकादमी (एन.सी.पी.ए.) का प्रतिष्ठित टाटा सभागार.
नवम्बर 2010 की 12 तारीख़ और दिन शुक्रवार. 
आज ही टाइम्स ऑफ़ इंडिया और लवासा सिटी के मुख्य प्रायोजन में मुंबई की साहित्यिक बिरादरी "लिटरेचर लाइव 2010" के इस तीन दिनी आयोजन की शुरूआती आगवानी कर रही है.दिन भर इतर विषयों पर चली साहित्यिक बहस के बाद शाम, प्रसिद्ध अभिनेता अनुपम खेर से रूबरू होने के लिए उतावली है. सभागार खचाखच भरा हुआ है फिर भी 'पिन ड्रॉप साइलेंस' जैसा कुछ है.
सभी टकटकी लगाये हुए मंच पर देख रहे हैं कि मंच के किस कोने से अनुपम खेर अपनी एंट्री लेते हैं.  
चुप्पी को तोड़ते हुए अचानक  एक आवाज़ उस तरफ से आती है जहाँ से दर्शक सभागार में दाख़िल हुए हैं - "क्या बात है आप सब लोग इतने चुप क्यों हैं..बातें कीजिये..."
सभी अपने मुंह उस आवाज़ की ओर ले जाते हैं. एक पल को सब ख़ामोश और दूसरे ही पल एक गोरे-चिट्टे मझोले क़द के दबीज़-सी शख्सियत वाले जाने-पहचाने आदमी को देखकर लोग हैरत और विस्मय से देखकर तालियाँ बजाने लगते हैं.
जी हाँ, ये तालियाँ अनुपम खेर के लिए ही हैं. अनुपम अपने इसी अंदाज़ में दर्शकों से रूबरू होते हैं.
पूरे सभागार में बैठे लोगों से मिलते हैं, उनसे बातें करते हैं और मंच पर आने की अनुमति लेते हैं.
......और इस तरह शुरू होता है अनुपम खेर के एकल अभिनय वाला उनका बहुचर्चित नाटक "कुछ भी हो सकता है". 

फ़िरोज़ अब्बास खान के निर्देशन में अनुपम अब तक इस नाटक की कुछ 200 से ज़्यादा प्रस्तुतियाँ दे चुके हैं.

कहानी अनुपम की स्वयं की जीवनी है जिसमें उन्होंने अपने शिमला से निकल कर बॉलीवुड तक का सफ़र अपने उसी अंदाज़ में बयां किया है जिसके लिए वो जाने जाते हैं. बचपन,लड़कपन,जवानी,शिमला, दादाजी की सीखें और दादी की बचपन में सुनाई कहानियां, माँ-पिता की बातें और घर के संस्कार, मित्र, पहला प्रेम, एन.एस.डी.और अपने गुरु, मुंबई, संघर्ष, फ़िल्मी करियर और इन सब के साथ जुड़े ज़िन्दगी के तमाम उजले-धुंधले, खट्टे-मीठे अनुभव और याद के रंग, जब ख़ुद अनुपम की ज़ुबानी मंच पर अभिनीत होते हैं तो तीन घंटे कैसे गुज़र जाते हैं पता भी नहीं चलता. अपने  हास्य बोध और ह्यूमर के  मिले-जुले के साथ  खेर अपनी ज़िन्दगी के तमाम उतार-चढ़ाव और संघर्ष की दास्तान को अभिनय से बहुत उंचाई पर ले जाते हैं.  


ज़िन्दगी के फलसफे को प्रस्तुत करते हुए खेर, कई बार बचपन में की गयी कई शरारतों को उसी मासूमियत और चुहल से एक बार फिर जीते दिखते हैं और अपनी अदायगी से दर्शकों को हंसा-हंसा कर लोटपोट कर देते हैं तो कहीं-कहीं संघर्ष के दिनों में धूल फांकती अपनी ज़िद और जद्दोजहद के कई घटनाक्रमों से आँख गीली कर जाते हैं. इन सबके बीच किसी भी परिस्थिति में हमेशा सकारात्मकता और ऊर्जा बटोर लेने की अपनी फ़िलोसोफी के फ़ायदे गिनाना भी नहीं भूलते हैं.  

मज़ेदार तरीके से एक किस्सा सुनाते हुए खेर कहते हैं कि "फिल्म सारांश में बी.बी प्रधान के रोल के लिए मैंने 6 महीने तक उस किरदार पर काम किया और जब रोल उनके बजे स्व. संजीव कुमार को दिए जाने की बात सामने आयी तो उन्होंने महेश भट्ट को श्राप देते हुए उनसे कहा कि आप ने मुझे धोखा दिया है. महेश ने मेरी बात को सुना और फिर सारांश का वह रोल मुझे ही करने को मिला"

अनुपम खेर ने अपने अभिनय से उन तमाम गुज़रे अनुभवों को बहुत गहराई,सूक्ष्मता, ईमानदारी और  पारदर्शिता से साझा किया है जो उन्हें एक अभिनेता के रूप में स्थापित और सर्वमान्य कलाकार का दर्जा दिलाने वाले कारक सिद्ध हुए हैं. यही कारण है कि संग-ए-मील के अपने तमाम साथी दादा-दादी ,माँ-पिता, दोस्त विजय सहगल, रंगमंच के अपने गुरुओं स्व.बलवंत गार्गी, अमल अलाना और इब्राहीम अल्काज़ी, फ़िल्म इंडस्ट्री के मित्र महेश भट्ट,सुभाष घई, स्व.संजीव कुमार, सतीश कौशिक, पत्नी किरण खेर आदि और उनके क़िस्से कई बार ज़िक्र में आते हैं.
अपने जीवन के तमाम उतार-चढ़ाव  और सफ़लता-असफ़लताओं के बीच गहरी रेखा पाटने वाले खेर अपनी इस कहानी में, कभी जिंदगी की कड़वी सच्चाई को हास्य के रूप में तो कभी उस सच्चाई का सामना कर के उस से लड़ने की कूबत अर्जित करने के रूप में, उम्मीद और उजाले की संभावनाओं को हर क्षण तलाशते दिखाई देते हैं. 

अनुपम खेर को मंच पर देखना वाकई रोमांचक है. नैरेटिव शैली का यह प्रदर्शन इस अर्थ में भी अलग है कि खेर ने आमफहम मंचन की सारी औपचारिकताओं से परे इसे क़िस्सागोई का एक ऐसा फॉर्म दिया है जिसमे वो कई बार दर्शकों के साथ कई और बातें करते हुए उनके साथ एक आम दर्शक ही बन जाते हैं और फिर एक झटके में पुन: किरदार में वापस आ जाते हैं.ये उनकी अपनी ज़बरदस्त प्रतिभा ही है जिसमें उन्होंने अपने सम्पूर्ण अभिनेता होने का वो प्रमाण दिया है जिसकी दरकार कभी भी नहीं रही...!!



Monday, July 26, 2010

नये सपने, नया आकाश

नये सपने, नया आकाश
नई उमंगें, नया उल्लास .
नये रंग, नई जंग
नई ज़िन्दगी, नये ढंग.
नई धरती, नया आसमाँ
नई इबारत, नई दास्ताँ.
नई सुबह, नई धूप
नई रंगत, नये रूप.
नई चाह, नई बुनावट
नया हौसला, नई आहट.
नया साल, नये पंख
नये सपने, नया आकाश......


Wednesday, October 22, 2008

बेचैनी - एक sketch

कभी कुछ कर जाने की जिद
कभी कुछ भी कर जाने की हद।
कभी उम्मीदों का सैलाब
कभी जिस्मो-रूह से फूटते जज़्बात।
कभी रेंगती कलम का किनारा
कभी स्याह रातों में उजले ख़्वाबों का सहारा।
कभी छटपटाहट इस कदर की कुछ सूझे ना
कभी मचलती आंखों से आंसू रुकें ही ना।
कोई सदा जो हर पल कानों में गूंजे
कभी कोई तलाश जिसे सपने हर आहट पर ढूंढें ।
कोई मचलता अफ़साना जो यूँ ही होठों पर आ जाए
कभी कोई गुज़रा वक़्त जो सड़कों पर तैरता दिख जाए।
तड़प
जो अक़्सर ख़ामोश होती है ,
भीतर सुलगती है .
जैसे हो कोई ओस की बूंद
जिसे छूने
और
उस छुअन को उंगली पर बार-बार महसूस करने का अहसास
गालों पर
आंसुओं की लकीरों से बना कोई रास्ता होगा
और
जो इसी तड़प के सहारे
शायद
चाँद तक जाता है ।

ख़्वाब - एक sketch

ख़्वाब
एक उम्मीद कुछ करने की
एक लौ हमेशा जलने की।
एक रास्ता मंज़िल तक जाने का
एक हौसला आसमान छू आने का।
एक हिम्मत मुश्किलों से जूझने की
एक कोशिश नाकामियों को सहेजने की।
एक जोश खून मे उबाल आने का
एक इरादा आख़िर में चाँद तक पहुँच जाने का।
एक कसक रफ़्तार को पाने की
एक तड़प आंखों मे पानी आने की।
एक उड़ान दूसरी दुनिया तक जाने की
एक सहर इरादों में नए पंख आने की।
एक लम्हा जो ज़िन्दगी भर याद रहे
एक साहिल जो कोहरे को भांप रहे।
ख़्वाब ,
जैसे हो फूल कोई
जो संदली ओढे रहे
एक ओस की बूंद
जो लम्स को सांसों से जोड़े रहे ।
ख़्वाब
जो मन बावरा देखता है
और जिसे फिर-फिर देखने को मन
हर पल मचलता है.......

मैं

जिस्म के अन्दर पनपते सपनों के आगे और  जिस्म के बाहर सपनों के पीछे दौड़ते-भागते सांसें कभी...