और
जिस्म के बाहर सपनों के पीछे दौड़ते-भागते
सांसें कभी-कभी फूलने लगती हैं,
थक जाता हूँ मैं यूँ ही दौड़ते हुए,
इसलिए रुक जाता हूँ
और
फिर कभी-कभी सोचने लगता हूँ
कि
छोड़ दूँ सपनों के पीछे भागने की आदत,
और
दफ़न कर दूँ इच्छाओं को.
लेकिन
सांस जब ढलने लगती है
बेचैनी तब भीतर सुलगने लगती है ,
जो कभी रुकने नहीं देती मुझे.
जब-जब भी दुनिया के सामने बौना समझता हूँ ख़ुद को,
बुलबुले छटपटाहट के शोर मचाने लगते हैं
और
मैं दुगुनी ताकत से फिर-फिर खड़ा होने लगता हूँ
और भी बड़े सपने देखने लगता हूँ.
सपनों के ये पंख मुझे आसमान में उड़ा ले जाते हैं
और वहां से मुझे दुनिया बौनी दिखाई पड़ती है !!