Thursday, March 24, 2011

मैं


जिस्म के अन्दर पनपते सपनों के आगे
और 
जिस्म के बाहर सपनों के पीछे दौड़ते-भागते
सांसें कभी-कभी फूलने लगती हैं,
थक जाता हूँ मैं यूँ ही दौड़ते हुए,
इसलिए रुक जाता हूँ  
और
फिर कभी-कभी सोचने लगता हूँ 
कि
छोड़ दूँ सपनों के पीछे भागने की आदत,
कर लूँ समझौता समय से
और
दफ़न कर दूँ इच्छाओं को.

लेकिन 
सांस जब ढलने लगती है 
बेचैनी तब भीतर सुलगने लगती है ,
जो कभी रुकने नहीं देती मुझे.
जब-जब भी दुनिया के सामने बौना समझता हूँ ख़ुद को,
बुलबुले छटपटाहट के शोर मचाने लगते हैं
और
मैं दुगुनी ताकत से फिर-फिर खड़ा होने लगता हूँ
और भी बड़े सपने देखने लगता हूँ.

सपनों के ये पंख मुझे आसमान में उड़ा ले जाते हैं 
और वहां से मुझे दुनिया बौनी दिखाई पड़ती है !!

Wednesday, March 9, 2011

मन की बात

Hello Friends,
First of all thank you so much for your comments. I am happy that you liked whatever i have posted.Its more of an appreciation and encouragement for me to write and write and write. 

"लिखना अपने आप में बेहद सुकून और बेचैनी देता है. ये एक अजीब-सी दुविधा होती है. जब तक आप कुछ लिख न लो तब तक बेचैनी होती है और जब लिख लो तो एक तसल्ली-सी मिल जाती है. जैसे बीच लहरों में थपेड़े खाने के बाद नाव को कोई किनारा मिल गया हो. और उसके बाद, अपने लिखे को सुनाने का तो मज़ा ही कुछ और है.
 

'अहा! ज़िन्दगी'  के एक अंक में छपी  प्रसून जोशी की बात का सहारा लेकर अपनी बात खत्म करता हूँ . प्रसून कहते हैं कि "रचनात्मक लोग मूडी और असुरक्षित होते हैं, इसलिए आप कोई कविता लिखने के बाद उसे किसी को सुनाना चाहते हैं. आप किसी और को अपनी अन्तश्चेतना में आने देते हैं" 

I want to add one more thing to this that it's mainly because we also want to be sure about any mistakes/ areas of improvements etc.
 

Until i post some new things and ask for your feedback i think this is enough.
Thanks again....and have a great day ahead.

Tuesday, March 8, 2011

कतरन-4

सोचा था पंख फैला कर अपने
नाप लूँगा सारा आसमान
मगर यहाँ तो पंख खोलने भर की जगह नहीं

मुंबई बहुत बड़ा शहर  है !!

कतरन-3

सूरज की पहली किरण पड़ने के पहले ही
बता दिया कबूतर ने गुटुर गुटुर करते बालकनी में
निकलना होगा सवेरे ही जीवन की तलाश में

माँ,
बंद करो खिड़की, 
कबूतर चिल्ला रहे हैं
अच्छा सपना देख रहा था टूट गया !!

कतरन-2

आ गया फिर से मेरे घर पर
पुराने अखबारों की रद्दी खरीदने वाला
आज फिर चूल्हा जलेगा किसी के घर का

अखबार की ताकत आज फिर पता चली !!

कतरन-1

कितना आसान है
सपने की तरह
ज़िन्दगी को जीना.

कितना कठिन है
दवा की तरह
ज़िन्दगी के कड़वे घूंट पीना.

A meeting with Gulzar sahab

अलसायी-सी सांझ थी वो बांद्रा फोर्ट की 
जब समंदर दे रहा था उस सांझ को
सरसराहट के छपाके
वहीँ उसी किनारे झुरमुटियों के बीच बसे एक रेहटी मंच के पास
झक-सफ़ेद कुर्ते में
पाँव ऊपर पाँव धरे
और ठ्योरी पर हाथ रखे
दिखाई दी मुझे वो नज़्म
पीछा कर रहा था जिसका मैं कुछ समय से !!
शब्दों से तो फिर भी मुलाकात थी, उसके
पर आवाज़ अब भी अनजानी ही थी मुझसे !!
अचानक झन्नाए कान के परदे
नज़्म भीतर प्रवेश कर रही थी ..

अहा !! क्या नज़्म थी
गुलज़ार नाम की.
मुझसे इस नज़्म का वादा था, मिलेगी मुझको
कल शाम मिली मुझे
बांद्रा फोर्ट में

सिगरेट



 
हाथों की उँगलियों में फँसी
धीरे-धीरे सुलगती
धुआँ उड़ाती
राख बनाती
निगोड़ी मस्लहत के मानी सिखा रही है मुझको

ख़ामोशी भी आग हो सकती है …..

पेन्सिल

कापी के अनबांचे पन्नों पर
पेन्सिल से कुछ कुरेदने लगा हूँ
इन दिनों
जाने कब पेन्सिल
बन गयी ज़रिया फिर से
पेन्सिल वही
लिखना जिससे छोड़ चुका था,
तीसरी या शायद चौथी में
ताकि पेन पकड़कर
आगे बढ़ जाऊं
सयाना कहलाऊं
आज
फिर लौट रहा हूँ
अतीत में
बटोरना चाह रहा हूँ
इधर-उधर छिटकी
नादानी
वो बचपन की
और
उस अपढ़ उम्र की
शब्द
जो सीखे थे उन दिनों
और
उकेर लिया था जिन्हें
मन की कोरी किताब पर
यथा रूप
उस निपट-सहज वय में
आज अर्थ उनके खुले हैं कई,
बहुत सारे


लौटना चाहता हूँ
उस बचपन में फिर से
और
थामना चाहता हूँ
वही पेन्सिल
जो
उस ज़माने में
कापी के केनवास पर
रच देती थी सारा जहां
लौटना चाहता हूँ
उन्हीं शब्दों में
जो
पेन्सिल की जुबानी तुतलाते थे उन दिनों
लौटना चाहता हूँ
उसी सयानेपन में
जहाँ मन का पनीलापन सारा आसमान था
लौट पाना पर, अब
मुमकिन नहीं किसी भी तरह
वक़्त का ' आज ', क्योंकि
घूर रहा है मुझे,
ज़माना भी दौड़ रहा है,
फिर शब्द और बचपन भी वैसे न रहे
और पेन्सिल
अब शायद वो भी सयानी हो गयी है !!

इंतज़ार






करते हुए इंतज़ार तुम्हारे आने का
घिर आयी शाम
डूबने लगा सब्र का सूरज
लौटने लगे पंछी घोंसलों में
धीरे-धीरे हर पेड़ की शाख हरहराने लगी
दिन भर की वीरानगी अब जाने लगी
सिवाय मन की
जो आहिस्ता से पनपते
भीतर मेरे
अपना दायरा बढ़ाने लगी....

मैं

जिस्म के अन्दर पनपते सपनों के आगे और  जिस्म के बाहर सपनों के पीछे दौड़ते-भागते सांसें कभी...